ज़्यादातर सही
AI तकनीक की भारी बिजली खपत के कारण विभिन्न देशों में विद्युत ग्रिड पर लागत का दबाव एक गंभीर मुद्दा बन गया है। AI डेटा सेंटरों की तेज़ी से बढ़ती ऊर्जा मांग के सामने विद्युत नेटवर्क के विस्तार और उसकी लागत को लेकर चर्चा गर्म है। हालांकि इस मुद्दे पर आंकड़ों की व्यापक रेंज है और कुछ पहलू अनुमान या राय आधारित हैं।
AI, खासकर बड़े भाषा मॉडल (LLM) के प्रशिक्षण और संचालन के लिए डेटा सेंटरों को परंपरागत रूप से काफी ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) जैसे संस्थानों के विश्लेषणों में AI और ऊर्जा के बीच बढ़ते इस अंतरसंबंध पर प्रकाश डाला गया है। इसी वजह से AI को कई जगह 'बिजली पीने वाला दैत्य' कहा जाने लगा है।
AI डेटा सेंटरों की मांग के कारण कई देशों में विद्युत ग्रिड को मजबूत और विस्तारित करने पर अतिरिक्त लागत आ रही है। इस लागत की भरपाई किसके ऊर्जा बिल के माध्यम से होगी — यह सवाल विभिन्न देशों में बहस का विषय बना हुआ है। ब्रिटेन सरकार (DSIT) जैसे निकायों ने भी इस विषय पर नीति-स्तर पर ध्यान देना शुरू किया है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि AI की ऊर्जा खपत और उससे होने वाली ग्रिड लागत को लेकर विभिन्न स्रोतों में आंकड़ों की व्यापक रेंज है। कुछ आकलन स्थापित तथ्यों पर आधारित हैं, जबकि कुछ भविष्य के पूर्वानुमान या विशेषज्ञ राय हैं। इसलिए इस मुद्दे को पूरी तरह निर्विवाद सच कहना कठिन है।
कुल मिलाकर, AI की भारी बिजली खपत और उससे उत्पन्न ग्रिड लागत विवाद का यह दावा स्रोतों के आधार पर ज़्यादातर सही माना जा सकता है।