ज़्यादातर सही
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के एक अध्ययन में पाया गया कि पढ़ाई के लिए AI पर निर्भर रहने वाले विश्वविद्यालय छात्रों में 'संज्ञानात्मक ऋण' (cognitive debt) जैसी स्थिति सामने आई, जिसे AI के प्रति अति-निर्भरता से उत्पन्न 'संज्ञानात्मक समर्पण' के रूप में वर्णित किया गया है। अध्ययन के अनुसार, AI से सीधे उत्तर लेने वाले छात्रों की स्मरण-क्षमता और समझ अपेक्षाकृत कमजोर पाई गई।
MIT के शोधकर्ताओं ने छात्रों को समूहों में बांटकर लेखन कार्य कराया। एक समूह ने AI उपकरणों का उपयोग किया, जबकि अन्य समूहों ने सामान्य तरीके से या केवल इंटरनेट सहायता से लेखन किया। परिणाम बताते हैं कि AI का उपयोग करने वाले छात्रों ने अपने लिखे हुए कंटेंट को याद रखने में कठिनाई महसूस की और उनकी मानसिक सक्रियता कम पाई गई।
अध्ययन के अनुसार, जब छात्र लगातार AI से उत्तर लेते हैं तो गहन सोच-विचार की प्रक्रिया कम हो जाती है। इस घटना को शोधकर्ताओं ने 'संज्ञानात्मक समर्पण' की संज्ञा दी है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपनी स्वयं की सोच के बजाय AI के दिए गए उत्तरों को बिना परखे स्वीकार करने लगता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि AI का उपयोग पूरी तरह बुरा नहीं है, लेकिन सीखने की प्रक्रिया में इसकी भूमिका और सीमाओं पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। शैक्षिक संस्थानों के लिए AI के संतुलित उपयोग के दिशानिर्देश बनाना एक चुनौती बन गई है।
MIT अध्ययन के निष्कर्ष और उसकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, इस दावे का निर्णायक मूल्यांकन है: ज़्यादातर सही